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छठी शताब्दी पूर्व में समकालीन ब्राह्मण, बौद्ध, जैन और आजीवक नाम से चार प्रमुख धर्म (विचारधारा) पूर्ण विकसित थी जिसके संस्थापक क्रमशः काल्पनिक शक्ति, बुद्ध, महावीर और मक्खली गोसाल थे। आज आजीवक धर्म की कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। हमें जो भी थोड़ी बहुत जानकारी आजीवकों के बारे में मिलती है वह केवल ब्राह्मण, जैन और बौद्ध ग्रंथों में लिखी उनकी आलोचना से मिलती है। जिसमें आजीवकों को स्त्री गुलाम, भोगी, मलिच्छ, देवी- देवताओं की मूर्तियों पर मल मूत्र त्यागने वाला, मूर्ख, घमंडी, भाग्यवादी (नियतिवादी) आदि रूप से बुरा भला कहा गया है। अर्थात ये तीनों धर्म आजीवकों के विरोधी थे। आज आजीवक कल्याण एवं विकास अनुसंधान ट्रस्ट (AWDRT) आजीवक दर्शन को विज्ञान, प्राकृतिक नियमों और संविधान की मूल भावना के आधार पर व्याख्या करके पुनर्स्थापित कर रहा है। आजीवक धर्म को स्वयंभुओं ने विलुप्त धर्म कहा जबकि यह कभी विलुप्त हो ही नहीं सकता । क्योंकि यह पूर्णतया प्राकृतिक नियमों पर आधारित है। प्राकृतिक नियम/विज्ञान ही असली सनातन धर्म है। पूरे नंद वंश काल और मौर्य वंश में बिंदुसार के समय में इसका पूरा बोलबाला था। अशोक और उनके पोते दशरथ ने आजीवकों को बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर की 3 - 3 गुहाएं दान करके इस धर्म को संरक्षित किया। कबीर, रविदास, फूले, पेरियार, गुरुनानक आदि महापुरुषों ने इसका बहुत विस्तार किया। आज संविधान में भी इसी धर्म की विचारधारा को महत्व दिया गया है। संविधान निर्माताओं ने सभी धर्मों में व्याप्त बुराइयों को अमान्य / अधर्म घोषित करके संविधान को जनकल्याणकारी बनाकर इसी जीवन में खुशी, सुख और समृद्धि भरने का काम किया है। वास्तव में यह धर्म कभी भी विलुप्त / नष्ट हुआ ही नहीं बल्कि स्वयंभुओं ने इसका ज्यादातर हिस्सा अपने साथ जोड़कर अपने को सनातन घोषित करके बड़े बड़े धन्नासेठों, साहूकारों या राजाओं को अपने पक्ष में लाकर बड़े बड़े संसाधनों द्वारा मूर्तियों, मठों, धार्मिक स्थलों, धार्मिक शिक्षा संस्थानों को बनवाकर जनता को मदद के नाम पर अनेक प्रकार के अनैतिक दबाव बना कर उनकी कमाई के हिस्से को अपनी ओर खींच कर उपभोग करने लगे । इस प्रकार से आजीवक समाज टूट कर कई धर्मों में विभाजित हो गया। किंतु उन्होंने विभिन्न धर्मों में जाने के बाद भी अपनी मूल पहचान को बनाए रखा है। उदाहरण के तौर पर शादी करना, बच्चे पैदा करना, उनकी देखभाल करना, आत्मरक्षा करना, उन्हें आजीविका के काम सिखाना आदि आदि। स्वयंभुओं की तरह आज की भी ज्यादातर सरकारें जनता को मुफ्त राशन, लैपटॉप, घर, टॉयलेट, मुफ्त बिजली, पानी, धार्मिक यात्रा, सम्मान निधि आदि देकर और बड़े बड़े धार्मिक स्थल और महापुरुषों की मूर्तियां बनावाकर कर संविधान विरोधी कार्य करके लोगों को ठग/लूट रही हैं। आजीवक कल्याण एवं विकास अनुसंधान ट्रस्ट आज आजीवक समाज को इकठ्ठा करके उन्हें जागृत कर रहा है। लोगों को मानव जीवन के सभी रहस्यों (पैदा होने के पहले से लेकर, वाल्यावस्था, जवानी, बुढ़ापा, मृत्यु और उसके बाद) को वैज्ञानिक और प्राकृतिक नियमों की कसौटी पर कसकर प्रशिक्षित कर रहा है। जिससे समाज में आजीवक/ विद्वान / सर्वज्ञानी / समझदार / सर्वश्रष्ठ लोगों को पैदा किया सके और उन्हें बिना पैसा खर्च किए ग्राम सभाओं, विधान सभाओं और संसद में पहुंचाया जा सके। जो संविधान की मूल भावना के अनुकूल सभी के लिए समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा , स्वास्थ्य देखभाल सुविधा , घर तक न्याय और कम वेतन अनुपात वाली रोज़गार की गारंटी प्रदान करवा सकें। जिससे हम आत्म निर्भर होकर ख़ुशी , सुख और समृद्धि हासिल कर सकें। आजीवक बनें। शक्तिशाली बनें। जय आजीवक ! जय भारत !

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